Sunday, 9 February 2020

फिर वो शाम




फिर वो शाम बीत गई,
फिर वो अंधेरी रात आ गई,
फिर वो तुम्हारे यादों के पन्ने खुल गए,
फिर मेरे होंठ खामोशी से सिल गए,
ज़िन्दगी के उन लम्हो को दोहराना,
काफी कुछ कहना है फिर भी चुप रहना,
नम आंखे और तकिये का भिगोना,
तेरी काल्पनिक बाहों में लिपटकर सुकून से सो जाना।

आखिर कब तक ये दोहरवू मैं,
एक बार तो तू मिलने आ,
दुनिया की हर खुशी से मिलवाऊ मैं,
सच्चाई से वाक्विफ हू, तू ख्वाबों में ही आजा,
फिर से गले लगकर, खुशी के आँसू बहाकर, थोड़ा हाल जानकर,थोड़ा हँसकर,थोड़ा साथ होने का एहसास दिलाकर,तू चली जाना।

इस अधूरी ख्वाहिश को तू पूरा न कर पाएगी,
सालो बीत जाएंगे पर तू न आएगी,
जबतक ज़िंदा हू, तब तक ये न हो सकेगा,
मर कर फिर से ये बंदा, तेरी कोख़ से ही तो जन्मेगा,
इस पार तो तूने मेरा साथ है छोड़ा,
उस पार न जाने क्या होगा,
जो होगा अच्छा होगा,
ये ही सोचते हुए,
फिर वो शाम बीत गई,
फिर वो अंधेरी रात आ गई,
फिर वो तुम्हारे यादों के पन्ने खुल गए,
फिर मेरे होंठ खामोशी से सिल गए।

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